Wednesday, 15 October 2014

"Bye Bye सुमि"



10वीं कक्षा में पढ रहा था तो बगल वाले घर में एक लड़की रहा करती थी। पूरा नाम तो कभी पता नहीं चला, पर उसके घर वाले उसे ‘सुमि’ बुलाया करते थें। वो रोज़ 9 बजे स्कूल बस के इंतज़ार में अपने घर के गेट के सामने खड़ी हो जाती और मैं उससे 15 मिनट पहले अपने गेट के सामने खड़ा हो जाता - उसके इंतज़ार में। कभी कभी जब मुड़कर वो मेरी तरफ देखती, तो मैं मुस्कुरा दिया करता था। शायद एक दो बार उसने भी अपनी मुस्कराहट बहकी हवाओं में लपेटकर मुझे भेजा था। शायद या यक़ीनन में मैं उलझना नहीं चाहता हूँ, जो भी रहा हो, मेरा दिन काफी रूमानी सा गुज़रता था।

95-96
में शाहरुख़ खान की DDLJ का गज़ब हल्ला फैला हुआ था। मैंने भी उस फिल्म के कई नुस्खे आजमाया, खासकर वो ‘पल्लट’ वाली। नौवीं क्लास में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। कहानी वही ख़त्म हो गयी। गर्मी की छुट्टियों में जब वो लौटकर आयी तो पता चला कि उसके पापा का ट्रान्सफर हो गया है। जब पहली बार सुना, तब चारो ओर अजीब सी मायूसी छा गयी। मुस्करा भी रहा था और मुस्करा भी नहीं पा रहा था। एक सप्ताह तक 9 बजने में 15 मिनट पहले गेट पर जाता, कुछ पत्थर चुनता, इधर उधर फेंक के बापस घर में चला आता। एक दिन तो इतना बुरा लगा था कि आईने के सामने खड़े होकर, सर को थोडा सा झुकाकर, हाथ आगे की ओर बढाकर फ़िल्मी अंदाज़ में बोल पड़ा -"तुसी जा रहे हो, तुसी मत जाओ"।

साला न तो म्यूजिक था न ही स्पेशल इफ़ेक्ट, पर दिल का एक कोना किसी भी चीज़ से synchronize नहीं कर पा रहा था। किसी को बताने पर यही होता कि वो बुद्धिमान अपने अनुभव को Larger than life समझकर बक देता - "बेटा बचपन का इश्क, बचपना होता है". बचपन का इश्क, बचपना होता है; बुढ़ापे में पता नहीं कैसे वो शायरी बन जाता है।

मैं उस किस्से को किसी पुराने रुमाल की तरह भूल गया .

इश्क़ मुहब्बत तो समझिये बस कोका-कोला हो गया। सो मिला जुला कर गाड़ी 4 साल तक बिना पेट्रोल के चली और वही की वही पाई गयी। फिर दरभंगा की गाड़ी दिल्ली निकल पड़ी उसके बाद गुजरात (गाँधीधाम) में नौकरी लगी। रोटी और मोबाइल सिग्नल छोड़कर सब ढंग से मिल रहा था। एक दिन बचपन का ख्वाब तब जाग उठा जब गुजराती पेपर मे इंडिया-वेस्टइंडीज का वनडे मैच राजकोट में होने का शिड्यूल देखा। बस जूनून था टिकट का जुगाड़ किया और चल पड़ा।

Main
बस स्टैंड तक जाने के लिए एक कनेक्टिंग बस चलता है। चुकी टाइम discipline के लिए भारत का बहुत मज़ाक उड़ता है, इसलिए मैं एक घंटे पहले ही निर्धारित स्थान पर पहुच गया। 10-15 मिनट खड़े रहने के बाद नानी जब याद आने लगी, तब pesticides पीने का सोचना पड़ गया। कुछ डकारें मारकर जब सामान के पास पंहुचा तो scene कुछ ख़तरनाक हो चूका था। मेरे bag के पास एक सुन्दर सी लड़की खड़ी थी। अगला 10 मिनट सन्नाटे में गुज़र गया। न मैं कुछ सोच पा रहा था, और ना ही कुछ बोल पा रहा था। Probably, सुन भी नहीं पा रहा होऊंगा, इसलिए सन्नाटा था। 10 मिनट बाद

लड़की - आप राजकोट बस का इंतज़ार कर रहे हैं क्या?
मैं - हाँ
मैं - अ अ and you ?
लड़की - मैं भी, but they say कि अभी 20 मिनट लेट है
मैं - ohkay

ज़िन्दगी में बहुत चीज़ों के लिए सोचा है कि लेट हो जाए तो मज़ा आ जाये और no doubt आज भी वही सोच रहा था

मैं - Are you new in the city?
लड़की- नहीं, मैं 2 साल से यहीं हूँ
मैं - अच्छा शहर है न ?
लड़की - हाँ, आप नए हैं क्या
मैं - आप कह रही हैं तो नया ही होऊंगा

एक हलकी सी मुस्कराहट के बाद चाय का माहौल बन चूका था। मैं हवा में हलकी नमी और ठंडापन महसूस करने लगा। बहुत try मारा कि मुंह से भाप भी निकल आये। ख़ैर!

मैं- चाय या कॉफ़ी
लड़की - its fine

मैं यूँ गया और यूँ आया। हाहा आज sense of humor भी मस्त sense में था। लौटकर आया तो लड़की के साथ एक लड़का खड़ा था। अब मेरी किस्मत धोनी जैसी तो है नहीं कि वो उसका भाई निकलता। चाय की चुसकिया दिल पर खंजर चला रही थीं  

बचे बीस-तीस मिनट मैंने पत्थर चुनकर फेंकने में गुज़र दिए। Connecting बस में शांति से बैठकर गाने गुनगुनाने लगा। दुनिया को बस ये नहीं दिखना चाहिए था कि अभी यहाँ कोई accident हुआ है। बस में मेरे बगल में आकर वो खड़ी हो गयी। उसका boyfriend उसे छोड़ने तक ही आया था। जब तक वो बैठ पाती एक ज़नाब excuse me बोलकर मेरे साथ बैठ गए। अँगरेज़ गए पर इन्हें क्यूँ छोड़ गए।

30
मिनट में हम main bus-stand पर थें। उतरकर, मैंने पूछा राजकोट में कहाँ जाना है? उसने हसते हुए जवाब दिया - "मैं अहमदाबाद जा रही हूँ"। दो मिनट तक तो ऐसा लगा कि मैं भी वही चला जाऊ। न किसी ने नाम पूछा, न ही पता। बस पर वो बैठ चुकी थी....मैंने धीमे से बोला "Bye Bye सुमि"