Monday, 28 April 2014

सफल कंपनी का कुशल प्रबंधक


जब भी उन्हे देखता हूँ, क्यों मुझे लगता है ?
जैसे वें किसी नए जमाने के मुनीम है
नई वेष-भूषा और मुद्राओ वाले
इनका खोजी दिमाग दिन-रात करता रहता हिसाब
कि कितना रखा जाए, एक मनुष्य को घर में ?
कितना वर्तमान में, कितना भविष्य में ?
कितना रहने दिया जाए, एक मनुष्य के भीतर मनुष्य में ?
जब भी उन्हे बोलते सुनता हूँ, क्यों मुझे लगता है  
जैसे हमारे मोहल्ले के जुआरी है
पहन लिए हो एक नई पोशाक या फिर भाड़े के हत्यारें ने सीख ली हो विदेशी भाषाएँ, मुद्राएँ
उनकी ओर से आती हर आवाज मुझे दासता की निशानी लगती
वे हर बार हाँक लगाते अपने मालिकों की तरफ से
जैसे अपने अँतड़ियों को भी जुए की दाँव पर लगा बैठे है । 

जब भी उन्हे देखता हूँ, मुझे क्यों लगता है ?
जैसे वे हमारे समय के सफल नौजवान है
वे वहाँ पहूँच चूके है जहाँ हम भी पहूँचना चाहते थे शायद
वे हमारी उन्ही इच्छाओं को लेकर आगे बढे
वे नए बाजार के कारिंदे है
वे चलतें है एक सौदागर के आगे-आगे
उसकी ओर से हाँक लगाते
उसके लिए जगह बनाते
एक मनुष्य के जीवन में
वे अपने दिमाग को अधिक से अधिक
बिकाऊ बना रहे
और बेच रहे नए-नए मालिको कों ॥

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